पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच सऊदी अरब और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच ईरान को लेकर पर्दे के पीछे रणनीतिक बातचीत का बड़ा खुलासा हुआ है। अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी रक्षा मंत्री प्रिंस खालिद बिन सलमान ने एक गोपनीय बैठक में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और अन्य शीर्ष अमेरिकी अधिकारियों से कहा कि अगर अमेरिका ईरान के खिलाफ दी गई धमकियों पर कार्रवाई नहीं करता, तो तेहरान को और मजबूती मिलेगी और वह और आक्रामक स्थिति अपना सकता है।
सूत्रों के मुताबिक यह सीक्रेट मीटिंग व्हाइट हाउस के बंद कमरे में हुई, जिसमें विदेश मंत्री मार्को रुबियो, रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ, व्हाइट हाउस के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जॉइंट चीफ्स ऑफ स्टाफ के चेयरमैन भी मौजूद थे। बातचीत का मुख्य एजेंडा ईरान पर संभावित अमेरिकी सैन्य कार्रवाई और उसके क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर था।
सऊदी रुख इसीलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि पिछले कुछ सप्ताह में सऊदी नेतृत्व ने सार्वजनिक रूप से संयम और कूटनीति की बात कही थी, लेकिन निजी बातचीत में सऊदी रक्षा मंत्री ने अमेरिका को तत्काल कदम उठाने का दबाव बनाया।
व्हाइट हाउस की प्रतिक्रिया तो यह रही है कि पुल सुरक्षा विकल्प खुले हैं और ट्रंप ने अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है। अमेरिका ने खाड़ी क्षेत्र में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा दी है, जिसमें युद्धपोतों और एयरक्राफ्ट कैरियर्स की तैनाती शामिल है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि यह सिर्फ नज़रिये में दबाव कायम करने के लिए है या असल में सैन्य कार्रवाई की तैयारी है।
एक और रिपोर्ट के अनुसार अमेरिका और कई सहयोगी देशों ने ईरान के खिलाफ संभावित निशानों की सूची भी साझा की है, जिसमें प्रमुख परमाणु और सैन्य ठिकानों को शामिल किया गया है — हालांकि यह बताता है कि अगर सैन्य विकल्प चुने गए तो उसका स्केल कितना बड़ा होगा।
तेहरान ने भी अपने रुख को सख्त किया हुआ है। सरकारी बयान में कहा गया है कि ईरान किसी भी अमेरिकी दबाव के सामने पीछे नहीं हटेगा और दोनों — बातचीत और युद्ध — दोनों के लिए तैयार है।
ईरानी सेना और रिवोल्यूशनरी गार्ड्स (IRGC) ने तीनों मोर्चों — जमीन, हवा और समुद्र — में जवाबी रणनीति तैयार कर ली है और हार्मुज स्ट्रेट जैसे संवेदनशील इलाकों में ड्रिल और सैन्य गतिविधियाँ तेज कर दी हैं।
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव को लेकर कई क्षेत्रीय देशों ने संयम का आह्वान किया है और संघर्ष को क्षेत्रीय अस्थिरता तथा ऊर्जा बाजार पर गंभीर प्रभाव के रूप में देखा जा रहा है। यूएन जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों ने भी कूटनीतिक समाधान की अपील की है।
अमेरिका की बढ़ती सैन्य गतिविधियों और संभावित हमलों की अफवाहों ने क्षेत्रीय राजनीति को और जटिल बना दिया है, जिससे मिडिल ईस्ट में युद्ध की आशंका और बढ़ गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर अमेरिका ने सैन्य विकल्प चुना तो यह क्षेत्रीय तनाव को ओर बढ़ा सकता है, जिससे न केवल ईरान बल्कि उसके सहयोगी देशों और खाड़ी राज्यों पर भी इसका असर पड़ेगा। इस पूरी स्थिति में सऊदी अरब का दबाव एक बड़ा मोड़ माना जा रहा है — यह दर्शाता है कि अब मध्य पूर्व में नीति और सैन्य रणनीति में खुली गठजोड़ राजनीति चल रही है।











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