आईटी सेक्टर की दिग्गज कंपनी विप्रो को कर्नाटक हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अदालत ने कंपनी को अपने एक पूर्व कर्मचारी को मुआवज़ा देने का आदेश दिया है। यह मामला श्रम कानूनों और कर्मचारियों के अधिकारों से जुड़ा हुआ है, जिसमें कोर्ट ने साफ किया कि किसी भी कर्मचारी को बिना उचित प्रक्रिया के सेवा से हटाना कानूनन गलत है।
मामला विप्रो के एक पूर्व कर्मचारी से जुड़ा है, जिसे कंपनी ने सेवा शर्तों के उल्लंघन का हवाला देते हुए नौकरी से हटा दिया था। कर्मचारी का आरोप था कि उसे बिना उचित सुनवाई और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन किए बिना टर्मिनेट किया गया। इसके बाद पीड़ित कर्मचारी ने श्रम न्यायालय का रुख किया।
लेबर कोर्ट ने कर्मचारी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए कहा कि कंपनी द्वारा की गई बर्खास्तगी अवैध थी। कोर्ट ने यह भी माना कि कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का पूरा मौका नहीं दिया गया। लेबर कोर्ट ने विप्रो को कर्मचारी को मुआवज़ा देने का निर्देश दिया।
विप्रो ने लेबर कोर्ट के आदेश को कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दी। कंपनी का तर्क था कि कर्मचारी की सेवाएं नियमों के तहत समाप्त की गई थीं और कोर्ट को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
हालांकि, हाईकोर्ट ने कंपनी की दलीलों को खारिज करते हुए लेबर कोर्ट के फैसले को सही ठहराया।
कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि:
- कर्मचारियों को हटाने से पहले उचित जांच और सुनवाई अनिवार्य है
- किसी भी निजी कंपनी को श्रम कानूनों से ऊपर नहीं माना जा सकता
- प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत हर हाल में लागू होते हैं
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मुआवज़ा देना इस मामले में उचित और न्यायसंगत है।
यह फैसला आईटी सेक्टर और कॉरपोरेट जगत के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश माना जा रहा है। इससे यह साफ होता है कि बड़ी कंपनियों को भी कर्मचारियों के अधिकारों और श्रम कानूनों का सख्ती से पालन करना होगा।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय भविष्य में कर्मचारियों के मामलों में एक मिसाल (precedent) के तौर पर देखा जाएगा।
कर्नाटक हाईकोर्ट का यह फैसला कर्मचारियों के अधिकारों को मजबूती देता है और यह दर्शाता है कि न्यायालय कॉरपोरेट अनुशासन के साथ-साथ मानवीय और कानूनी संतुलन बनाए रखने के पक्ष में है। विप्रो जैसी बड़ी कंपनियों के लिए यह एक स्पष्ट संदेश है कि नियमों की अनदेखी महंगी पड़ सकती है।






Leave a Reply